Shiवाजी ने एक ख़त शाहजहाँ को भेजा कि मुग़ल साम्राज्य यदि शिवाजी द्वारा जीते गए बीजापुर के क़िले और इलाक़े का उसे स्वामी मान लें एवं दाभोल बंदरगाह व उससे लगा जीता गया इलाक़ा भी उसका मंजूर कर लें तो शिवाजी बीजापुर के विरुद्ध मुग़लों का साथ देने को राजी हैं । औरंगज़ेब ने गोल माल जबाव भेजा तो शिवाजी ने बीजापुर का साथ देने का निर्णय कर लिया । जब औरंगज़ेब औरंगाबाद से सुदूर दक्षिण – पश्चिम बीजापुर में युद्ध में संलग्न था उसी समय शिवाजी ने अहमदनगर से लगे चमरगुंडा और रेसीन पर आक्रमण किया और जुन्नार से तीन लाख हूंन लूट ले गए । औरंगज़ेब तब से ही शिवाजी से बुरी तरह चिढ़ गया । उसकी यह चिढ़ उसके जीवन के 27 साल एवं अकबर के ज़माने से इकट्ठा ख़ज़ाना लुटाकर भी ख़त्म नहीं हुई ।
छत्रपति शिवाजी महाराज और अफजल खान
अंत में औरंगज़ेब का शिवाजी से द्वेष मुग़ल साम्राज्य को ही के डूबा । औरंगज़ेब 1658 में शाहजहाँ के मरने पर उत्तराधिकार के झगड़े में शुजा , मुराद और दाराशिकोह को निपटा रहा था तो समय का फ़ायदा उठा कर शिवाजी ने कोलाबा , थाना , भिवंडी , कल्याण यानि आज का पूरा मुंबई जीत कर अपने राज्य में मिला लिया । पुर्तगाली इलाक़ों को लूटकर चौथ वसूलना शुरू कर दिया । कल्याण में लूट के माल में मुल्ला अहमद नवायत की अत्यंत सुंदर पुत्रवधू सेना के हाथ लग गयी , उसे शिवाजी को पेश किया गया क्योंकि उस समय राजाओं में यह प्रथा थी की दुश्मन की सुंदर औरतों पर सेनानायक या राज्य प्रमुख का अधिकार होता था । शिवाजी ने उसके धन ज़ेवरात सहित उसे ससम्मान बीजापुर सुल्तान को भिजवा दिया । शिवाजी और अफ़ज़ल खान । शिवाजी का पूरा जीवन साहसिक कारनामों से भरा पड़ा है । ऐसा ही एक दुस्साहसिक कारनामा उनकी अफ़ज़ल खान से मुलाक़ात थी । बीजापुर का सुल्तान जब शिवाजी से बहुत परेशान हो गया तो छुटकारा पाने के लिए अफ़ज़लखान अब्दुल्ला भटारी को चुना । जिसकी लम्बाई शिवाजी से एक फुट ज़्यादा थी वह अत्यंत बलशाली और तलवारबाज़ी में पारंगत सरदार था । उसने भरे दरबार में घमंड पूर्ण घोषणा की थी कि वो शिवाजी को घोड़े पर बैठे – बैठे ही गर्दन से घसीट कर सुल्तान के सामने ला पटकेगा । इसका उपयोग सलीम जावेद ने शोले में ठाकुर को घोड़े पर बैठे – बैठे ही गब्बर की गर्दन को हाथ में फाँस खींचकर ले जाने में किया था । सुल्तान ने उसे उस मुहिम पर भेजा ताकि शिवाजी से मुक्ति मिल जाए । अफ़ज़ल खान ने कुछ मराठा मावली कोली सरदारों को मिला लिया ।
वह सितम्बर 1659 में पंढरपुर पहुँचा वहाँ विठोवा मंदिर में मूर्ति तोड़ कर वाई पहुँचा । उस समय शिवाजी जावली के जंगलों में डेरा जमाए थे । वहीं उनको सूचना मिली । पहले अफ़ज़ल ने कृष्णाजी भास्कर नामक मराठा को दरबार में सम्मान दिलाने का लालच देकर बुलाने भेजा । शिवाजी को भास्कर से बातचीत में अफ़ज़ल के षड्यन्त्र पूर्वक उन्हें गिरफ्तार करने या मार डालने की गंध मिल गई । शिवाजी ने अपने दूत पन्ता जी गोपीनाथ को अफ़ज़ल की इच्छा जानने को भेजा । वह प्रतापगढ़ क़िले पर पार नामक गाँव में इंतज़ार कर रहा था । गोपीनाथ ने भी ख़तरे की जानकारी दी । शिवाजी ने अफ़ज़ल खान से डरने का अभ्यास करते हुए ख़बर भिजवाई कि वे बिलकुल अकेले में मिलना चाहेंगे । शिवाजी ने सुबह उठकर माँ भवानी की पूजा की उनकी भवानी तलवार ली । अंगरखे के नीचे लोहे का कवच पहन कर बाँए हाथ में बघनखा दाहिने तरफ़ कमर पर अंगोछे में कटार फँसा ली , सिर पर लोहे का टोप पहना और चलने को तैयार हो गए । अपनी सेना को प्रतापगढ़ की झाड़ियों में छुपा दिया । शिवाजी को सूचना मिली कि अफ़ज़ल खान के साथ एक हज़ार अचूक निशानेबाज़ हैं ।
उन्होंने मिलने से डरते हुए आने से माना किया तो अफ़ज़ल ने सैनिक हटा दिए । अफ़ज़ल खान अपने दो शस्त्रधारी सैनिको और एक निपुण ताक़तवर लड़ाका तलवारबाज़ी में पारंगत सैयद बाँदा को लेकर पंडाल पहुंचा । शिवाजी के साथ जीव महाल और शम्भुजी काव नामक दो सैनिक थे । 2 नवम्बर 1659 का दिन था । शिवाजी ने पंडाल में पहुँचते ही झुककर सलाम किया । अफ़ज़ल ने उन्हें गले लगाया तो शिवाजी उसके कंधे तक आए । उसने शिवाजी का गला दबा कर मारने की कोशिश की तब ही शिवाजी ने ख़तरा भाप कर बाएँ हाथ का बघनखा अफ़ज़ल के पेट में घुसेड़कर कर आतें बाहर निकल दी और झुककर दाहिने हाथ से कटार

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