हमारी कहानी सुदूर दक्षिण , पूर्वीतट , बंगाल , बिहार , उड़ीसा , अवध और कारा के इलाक़े से निकल कर अब मराठा हिंदू स्वराज की तरफ़ यात्रा करेगी । मराठों की उत्पत्ति के बार में जानना ज़रूरी है कि ये लोग कौन हैं ? कहाँ से नर्मदा – ताप्ती दोआब के दक्षिण और गोदावरी के कछार व कृष्णा की घाँटी में अरब सागर के पूर्वी घाट और बंगाल की खाड़ी के पश्चिमी घाट के बीच आकर बस गए थे । ऐसा माना जाता है कि आर्यों का आगमन काकेशिया पर्वतों से चलकर हिंदुस्तान के उत्तरी पश्चिमी सीमा से सप्त सिंधु पार करके हिंदुस्तान की सरज़मीं पर हुआ था ।
इसके पहले बहुत पहले द्रविड़ जातियाँ , अफ्रीका जब ऐशिया से जुड़ा हुआ था तब पेशावर होते हुए आ चुकी थीं । वहाँ की जुबान में तमिल के बहुत से शब्द मिलते हैं । आर्य इकट्ठा नहीं आए । कई खेपों में सैकड़ों सालों तक उनका आगमन होता । आज हम अंग बंग पंज जाट गुर्जर अहिर मार मालव मरहट्ठ छुद्रक बुंदेल बघेल नाम से निकले उपनाम सुनते हैं । ये उन आर्यों के कबीलों के नाम थे । जिनमे शक हूंन और भी कई नस्लें आकर घुल मिल गईं । उनकी अपने कबीलों की भाषा थीं । बाद में राजाओं और ऋषि मुनियों ने प्राकृत से देवनागरी में पाणिनि की व्याकरण मिलकर संस्कृत भाषा विकसित की । जो की साहित्य और राजकाज की भाषा थी । जैसे आज राजकाज और ज्ञान की भाषा अंग्रेज़ी हो गई है ।
मराठा सामाज्य का पतन आंग्ल-मराठा युद्ध
क़बीले अपनी प्रथकता बनाए रखते हुए अपनी संस्कृति और भाषा को बचाए रखे । संस्कृत के मेल से आज की मराठी बंगाली गुजराती हरियानवी पंजाबी विकसित हुईं हैं जो देवनागरी में ही लिखी जाती हैं । मराठा पहिले मरहट्टे कहलाते थे जो अपनी जान की बाज़ी लगा कर मरने तक लड़ते रहते थे , हटते नहीं थे । इनके 96 कुल बताए जाते हैं । पहले ये उत्तर में फैले थे । तुर्कों के लगातार आक्रमणों से इन्होंने संस्कृति और
धर्म की रक्षार्थ पश्चिमी तट से लेकर गोदावरी और कृष्णा के बीच असंख्य पहाड़ों में अपना ठिकाना बना लिया । ये बहुत स्वाभिमानी , मेहनती और अपनी संस्कृति पर गर्व करने वाले लोग होते हैं । ऐसी ही मराठा क़ौम में पैदा हुए थे , वीर शिवाजी । शाहजी भोंसले । हिंदुस्तान नौवीं से पन्द्रहवीं सदी तक सुल्तानी एकाधिकार तानाशाही का शिकार रहा जिसमें धार्मिक , आर्थिक , सांस्कृतिक या राजनैतिक सहिष्णुता का कोई प्रश्न ही नहीं था । रियाया लूटपाट , मारकाट , अव्यवस्था , अस्थिरता और भयानक कठिनाइयों का सामना करती थी । पूजा पाठ धार्मिक आयोजन सार्वजनिक नहीं किए जा सकते थे । हिंदू समाज को अंतर्मुखी होकर भगवान की भक्ति के अलावा कोई सहारा नहीं था । अकबर के आने के बाद स्थिति में बदलाव आया ।
जब बाहरी भौतिक पट बंद हुए तो आंतरिक हृदय में भक्ति काव्य फूट पड़ा । अकबर महान ने लालक़िले तक में पूजा पाठ की अनुमति दी और जजिया कर हटा दिया । लिहाज़ा तुलसीदास सूरदास मीरा हरिदास रैदास जैसे भक्त कवियों ने ऐसे पद रचे जो रामचरितमानस और भागवत पुराण के साथ आज तक हमारा मर्गदर्शन कर रहे हैं । उसी दौरान सोलहवीं – सत्रहवीं सदी में महाराष्ट्र के इलाके में तुकाराम , नामदेव , एकनाथ , वामन पंडित और महासमर्थ गुरु रामदास हुए । जिन्होंने भक्ति की अलख जगाई और सुधारवादी आंदोलन चलाए । अलाउद्दीन ख़िलजी द्वारा दक्षिण में इस्लाम का आगमन किया जा चुका था । बहमनी और विजयनगर साम्राज्य बिखर गए थे । उनकी बुनियाद पर अहमदनगर बीजापुर और गोलकुंडा राज्य खड़े हो गए थे ।
अहमदनगर की राजधानी दौलताबाद थी । उसके आसपास चारों तरफ़ कोली और मावले लोग बसा करते थे । वे एक बहादुर और लड़ाकू क़ौम थे अतः उनको सेना में जगह मिल जाती थी । तीन शताब्दी से यह प्रथा जारी थी तो मराठे युद्धकला में प्रवीण हो चुके थे । कोई – कोई मराठा उन्नति करके सेना नायक के पद तक पहुँच जाते थे । ऐसे ही एक मराठा थे शाहजी भोंसले । शाहजी भोंसले निज़ामशाही सुल्तान अहमदनगर की फ़ौज में एक सैनिक के रूप में भर्ती हुए थे । बहादुरी और मेहनत से वे सेना के कमांडर बन गए ।

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