अभी के कुछ नासमझ सभ्य लेखक शिवाजी पर लुटेरा होने का आरोप लगाते हैं लेकिन इतिहास जानने वाले अच्छी तरह से वाक़िफ़ हैं कि जो भी राजा बने , जिन्होंने राजवंश चलाया वे शुरुआत में लुटेरे ही थे और तलवार के बल पर अपने – आपको राजा स्वीकार करवा लिया करते थे । आज कोई भी यह मानने को तैयार नहीं है कि ईश्वर ने राजा को राज्य करने का अधिकार दिया था । यह अवधारणा यूरोप में ग्रीक सिद्धांत से प्रभावित चर्च से निकली हुई राजसत्ता ने निहित स्वार्थ से प्रचारित की थी । भारत में शुरू से ही गणराज्य जनपद होते थे । उनमें बारी – बारी से शासन अलग – अलग सभासद संभालते थे । कोई राजा नहीं होता था ।
महाजनपदो के आपसी संघर्ष में मगध जनपद बाक़ी सब को निगल गया । सिकन्दर के साथ राजा ईश्वर का प्रतिनिधि है की ग्रीक अवधारणा तक्षशिला पहुँची वहीं से चाणक्य और चंद्रगुप्त ने उठा ली । उसे सही ठहराने के लिए चंद्रगुप्त को महानंद का मुरा दासी से उत्पन्न पुत्र बताया गया और ईश्वर का प्रतिनिधि राजा की अवधारणा चल पड़ी । शिवाजी ने उस समय दुनिया की सबसे शक्तिशाली मुग़ल सत्ता से उनके ही देश में लोहा मनवाया । ऐसा उदाहरण दुनिया के इतिहास में नहीं मिलता है । शिवाजी की अदम्य इच्छा शक्ति ने उनसे जान जोखिम में डालकर अद्भुत काम करवाए । उनका एक काम था शाइस्ता खान के खेमे पर रात में हमला भूखे शेर की नाद में मेमने के घुसने की मानिंद था ।
शिवाजी और शाइस्ता खान
शाइस्ता खान बुरहानपुर का बाशिंदा ताजमहल की मालकिन मुमताज़ महल का भाई शाहजहाँ का साला और औरंगज़ेब का मामा था । वह एक अच्छा सेनानायक माना जाता था । औरंगज़ेब ने भाइयों का सफाया करके शिवाजी को ठिकाने लगाने की सोची । उसने शाइस्ता खान को दक्षिण का सूबेदार बना भेजा । शाइस्ता खान ने बीजापुर से मिलकर शिवाजी को घेरने की रणनीति बनाई । वह अहमदनगर से मराठा ठिकानों को जीतता चला और बीजापुर की सेना दक्षिण से बढ़ी । वो उत्तर की तरफ़ के शिवाजी के इलाक़े जीतते चले गए । यह काम शाइस्ता खान ने धीरे – धीरे दो साल में किया । वह पूना को जीतकर , जिस घर में शिवाजी का बचपन बीता था उसमें अपना हरम बना कर रहने लगा ।
अब शिवाजी के सामने करो या मरो की स्थिति थी । उन्होंने आक्रमण में ही सुरक्षा , के सिद्धांत पर मुग़लों का मनोबल तोड़ने की नीति के तहत शाइस्ता खान के खेमे पर रात में हमले की योजना बनाई । वो 15 अप्रेल 1663 की शाम को चुने हुए 200 सैनिकों के साथ पूना पहुँचे । जब घुसने लगे तो मुग़ल सिपाहियों के पूछने पर उन्हें बताया कि वे मुग़ल सेना के ही मराठा सिपाही हैं अपने ठिकानों पर जा रहे हैं । रात गहरी होने पर उन्होंने जहाँ शाइस्ता खान रुका था उसका दरवाज़ा दीवाल सहित तोड़कर निकाला । सबसे पहिले शिवाजी ने अंदर दाख़िल होकर शाइस्ता खान पर हमला किया उसके हाथ का अंगूठा कट गया वो भागा उसका लड़का सामने आया तो अपनी जान से गया । सैनिकों ने अंधेरे में जनान खाना की औरतों को मार दिया । शाइस्ता का एक लड़का 6 बेगम 20 औरतें मारी गयीं । जब तक मुग़ल फ़ौज नींद से जागती शिवाजी साथियों के साथ निकल लिए । इस घटना ने मुग़लों को हिला कर रख दिया शाइस्ता खान का तबादला बंगाल कर दिया गया । मराठों का आत्म विश्वास चरम पर पहुँच गया । यह था शिवाजी की साहसिक नेतृत्व क्षमता का अनुपम उदाहरण । सूरत की चढ़ाई । शाइस्ता खान और बीजापुर की मिलीजुली फ़ौज ने मराठा साम्राज्य का दक्षिण और उत्तर – पश्चिम का इलाक़ा जीत लिया था । लिहाज़ा शिवाजी को संघर्ष जारी रखने के लिए धन की ज़रूरत थी । उन्होंने 400 घुड़सवार तैयार किए और 10 जनवरी 1664 को रवाना होकर 16 जनवरी को सूरत जा पहुँचे । सूरत मुग़लों का एक मात्र बन्दरगाह था जहाँ से हज यात्री मक्का मदीना जाते थे और अंग्रेज़ व्यापारी जहांगीर के समय से फ़ैक्टरी लगाकर कारोबार करते थे । शहर धनाढ्य था । मुग़ल फ़ौजदार इनायत खान भाग कर क़िले में छुप गया । कारोबारियों और जनता को शिवाजी की लूट के लिए आज़ाद छोड़ दिया । शिवाजी ने 4 दिन खूब दिल से सूरत को लूटा । एक करोड़ हूंन से अधिक सोना – चाँदी हीरे – मोती लूट कर 20 जनवरी को सूरत छोड़ दिया । तब तक इस मुहिम की ख़बर औरंगज़ेब तक नहीं पहुंची थी । औरंगज़ेब और शिवाजी के बीच यह शह – मात का खेल लम्बा चला । अब बारी औरंगज़ेब की थी ।
उसने तिलमिलाकर उस समय के सबसे क़ाबिल मिर्जा राजा जयसिंह के नेतृत्व में बड़ी मुहिम शिवाजी के विरुद्ध छेड़ी , जिसका अंत शिवाजी की आगरा में नज़रबंदी से हुई । शिवाजी और राजा जयसिंह । जयसिंह आमेर के राजा थे जिन्हें मिर्ज़ा की उपाधि औरंगज़ेब ने दी थी । उन्होंने मुग़ल साम्राज्य के लिए कई मुश्किल लड़ाइयाँ जीतीं थीं और वे बहुत ही प्रतिभा सम्पन्न और कूटनीतिज्ञ व्यक्तित्व के धनी थे । सूरत में शिवाजी की कार्यवाही से रुष्ट होकर औरंगज़ेब ने मनचाहे सिपहसलार के अधीन मनचाही फ़ौज और मनचाहा धन देकर जयसिंह को शिवाजी को नियंत्रण में लाने भेजा । जयसिंह ने सबसे पहले बीजापुर गोलकुंडा को कूटनीतिक चालों में फाँसकर यह निश्चित कर लिया कि वे या तो तटस्थ रहेंगे या दक्षिणपूर्व से शिवाजी के राज पर हमला करेंगे । उसने कई मराठा सरदारों को फोड़ लिया । उसके बाद अफ़ज़ल खान के बेटे , जवाली के राजकुमार , जज़ीरा के सिद्दी और जो भी शिवाजी से द्वेष रखते थे , उन सबको इकट्ठा कर शिवाजी पर चारों तरफ़ से हमला किया ।
उसने सासबड से मुहिम शुरू की । कई सैनिक टुकड़ियों की छापामार लड़ाईयों से मराठों के गाँव उजाड़ना शुरू किया । शिवाजी की छापामार लड़ाई की काट राजा जयसिंह ने छापामार मुहिम से ही निकाली । वह शिवाजी को पुरन्दर के क़िले में घेरने चला । सबसे पहले पूर्वी किनारे का वज्रगढ़ का क़िला घेरा डाल कर जीत लिया । क़िले रक्षकों को मारे सुरक्षा का विश्वास पाकर शिवाजी सीधे राजा जयसिंह के पंडाल में पहुँच गए । जयसिंह ने आगे बढ़कर शिवाजी को गले लगाया और अपने पास बिठा लिया । उसी समय जयसिंह ने दिलेर खान और तीर्थसिंग नामक सिपाहसालारों को पुरन्दर पर आक्रमण तेज़ करने की आज्ञा दी । शिवाजी राजपूत खेमे से मराठों को मरते देखते रहे । जयसिंह दिखाते रहे ताकि समझौते की शर्ते मुग़लों के हित में तय हों । शिवाजी ने खून खराबा रोकने हेतु आत्म समर्पण की सहमति दे दी । शिवाजी और राजा जयसिंह आधी रात तक समर्पण की शर्तों पर बात करते रहे । अंत में पुरन्दर की संधि हो गई । शिवाजी ने 23 क़िले और उनसे जुड़ा इलाक़ा मुग़लों को सौंप दिया
। 12 क़िले और उसकी आय शिवाजी के पास रहे । शम्भा जी को 5000 घुड़सवार सैनिक के साथ मुग़लों की सेवा करनी होगी । शिवाजी को दक्षिण में मुग़लों की तरफ़ से युद्ध करना होगा । इसके बाद शिवाजी दक्षिण की सूबेदारी चाह रहे थे तो राजा जयसिंह ने पाँच हज़ारी मनसबदारी , अच्छी जागीर और 50 , 000 नक़द देकर और उसे दक्षिण की सूबेदारी मिलने की सम्भावना के मद्देनज़र औरंगज़ेब से आगरा में मिलने हेतु तैयार कर लिया । जयसिंह के पुत्र रामसिंह के सुरक्षा वचन और दरवार में सम्मान का भरोसा मिलने पर शिवाजी ने आगरा जाना मंजूर कर लिया । यह बहुत दुस्साहसिक निर्णय था । शिवाजी और औरंगज़ेब एक दूसरे के जानी दुश्मन थे । शिवाजी 16 मार्च 1666 को अपने पुत्र सम्भाजी 5 बड़े पदाधिकारी और 350 चुने हुए सैनिक दस्ते के साथ मौत से मुलाक़ात को आगरा रवाना हुए । ये अलग बात है कि बाद में वो मौत को चकमा देकर वापस रायगढ़ आ गए थे । धौलपुर के आगे मुंबई आगरा रोड पर सराय मानिकचन्द के खंडहर आज भी मौजूद हैं । 21 मई को शिवाजी वहीं रुके थे । रामसिंग के मुंशी गिरधारीलाल ने उनका स्वागत उस सराय में किया क्योंकि रामसिंग की तैनाती उस रात शाही महल पर लग गई थी । अगले दिन दीवाने आम

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