शिवाजी ने औरंगजेब के चंगुल से निकल कर स्थिति का जायजा लिया और सुदूर दक्षिण में साम्राज्य बढ़ाने के पहले पूना और आसपास को अपने अधीन करना शुरू किया । सबसे पहले कोंडना का क़िला पुनः प्राप्त किया जिसमें बहादुर ताना जी मलसुरे ने शेर की तरह दहाड़ते हुए रस्सी के सहारे दुश्मन के तीरों की बौछार के बीच क़िले पर चढ़कर दरवाज़ा खोल दिया । मराठा सेना ने घुसकर क़िला फ़तह किया था । तब शिवाजी का प्रसिद्ध वाक्य उच्चारित हुआ था । “ गढ़ आया पर सिंह गया ” तब से उस क़िले का नामकरण सिंघगढ़ क़िला कर दिया । आज भी वह क़िला पूना के पास अपने आगोश में एक निजी सिंहगढ़ विश्वविध्यालय लिए खड़ा
सूबेदारी से हटा दिया । वो पूना से आगरा लौटते समय बुरहानपुर में सदमे से बीमार पड़ कर स्वर्ग सिधार गए ।
शिवाजी ने सूरत को एक बार और लूटा । उसके बाद दक्षिण में कर्नाटक तमिलनाडु की तरफ़ विजय यात्राएँ कीं । उन्होंने पश्चिमी तट पर सूरत से गोवा तक , दक्षिण में तुंगभद्रा कावेरी के बेल्लारी चित्तूर अरकोट से लेकर उत्तर में पूना नासिक सतारा कोल्हापुर तक स्वराज खड़ा कर लिया । जिसमें 240 क़िले थे और ज़मीन से 7 करोड़ की सालाना राजस्व आमदनी होती थी । शिवाजी ने राज्याभिषेक करवाकर राजा छत्रपति की उपाधि धारण करने की सोची ताकि अन्य राज्यों से मित्रता संधि वार्तालाप बराबरी के स्तर पर हो । महाराष्ट्र के कट्टर पण्डितो ने उनका अभिषेक करने से मना कर दिया और उनको क्षत्री मानने से इंकार कर दिया ।
शिवाजी का सामाज्य छत्रपति मराठा के संस्थापक जीवनी
काशी के एक विद्वान पण्डित विश्वेश्वर गागभट्ट ने उनका राज्याभिषेक किया जिसमें 50 लाख रुपयों का खर्चा आया । वे छत्रपति की उपाधि धारण कर गद्दी पर बैठे और शासन व्यवस्था स्थापित की । उनके दो लड़के दो अलग पत्नियों से थे । सम्भाजी और राजाराम । सम्भाजी अय्याशी और नशे के फेर में पड़ गया । लाख समझाने पर भी नहीं सुधरा । उसे गुरु रामदास के पास भी रखा पर कोई सुधार न हुआ । उसे पनहला के क़िले में नज़रबंद कर दिया तो वह एक रात नज़र बचाकर अपनी पत्नी सहित मुग़लों के बहादुरगढ़ क़िले पर सेनापति दिलेरखान से जा मिला ।
औरंगज़ेब ने उसका उपयोग शिवाजी के विरुद्ध करना चाहा तो एक रात वह भाग कर पनहला के क़िले में वापस आ गया । शिवाजी ख़ुद उसके साथ कुछ दिन रहे । शायद सब सुधार जाए । परंतु नियति को कुछ और ही मंजूर था । वह नहीं सुधरा । उन्हें साम्राज्य का भविष्य लड़खड़ाता दिखाने लगा । शिवाजी निराश हताश होकर फ़रबरी 1680 में अपने गुरु रामदास के पास सज्जनगढ़ चले गए । लगातार तूफ़ानी गति से साम्राज्य खड़ा करने और कैद में रहने से उनका स्वास्थ्य गिर गया था एवं पुत्र की शर्मनाक स्थिति ने उन्हें अंदर से तोड़ दिया था । उनकी जीने की इच्छा जवाब दे चुकी थी
शिवाजी ने औरंगज़ेब के चंगुल से निकल कर स्थिति का जायजा लिया और सुदूर दक्षिण में साम्राज्य बढ़ाने के पहले पूना और आसपास को अपने अधीन करना शुरू किया । स
पहले कोंडना का क़िला पुनः प्राप्त किया जिसमें बहादुर ताना जी मलसुरे ने शेर की तरह दहाड़ते हुए रस्सी के सहारे दुश्मन के तीरों की बौछार के बीच क़िले पर चढ़कर दरवाज़ा खोल दिया । मराठा सेना ने घुसकर क़िला फ़तह किया था । तब शिवाजी का प्रसिद्ध वाक्य उच्चारित हुआ था । “ गढ़ आया पर सिंह गया ” तब से उस क़िले का नामकरण सिंघगढ़ क़िला कर दिया । आज भी वह क़िला पूना के पास अपने आगोश में एक निजी सिंहगढ़ विश्वविध्यालय लिए खड़ा
सूबेदारी से हटा दिया । वो पूना से आगरा लौटते समय बुरहानपुर में सदमे से बीमार पड़ कर स्वर्ग सिधार गए ।
शिवाजी ने सूरत को एक बार और लूटा । उसके बाद दक्षिण में कर्नाटक तमिलनाडु की तरफ़ विजय यात्राएँ कीं । उन्होंने पश्चिमी तट पर सूरत से गोवा तक , दक्षिण में तुंगभद्रा कावेरी के बेल्लारी चित्तूर अरकोट से लेकर उत्तर में पूना नासिक सतारा कोल्हापुर तक स्वराज खड़ा कर लिया । जिसमें 240 क़िले थे और ज़मीन से 7 करोड़ की सालाना राजस्व आमदनी होती थी । शिवाजी ने राज्याभिषेक करवाकर राजा छत्रपति की उपाधि धारण करने की सोची ताकि अन्य राज्यों से मित्रता संधि वार्तालाप बराबरी के स्तर पर हो । महाराष्ट्र के कट्टर पण्डितो ने उनका अभिषेक करने से मना कर दिया और उनको क्षत्री मानने से इंकार कर दिया ।
शिवाजी का सामाज्य छत्रपति मराठा के संस्थापक जीवनी
काशी के एक विद्वान पण्डित विश्वेश्वर गागभट्ट ने उनका राज्याभिषेक किया जिसमें 50 लाख रुपयों का खर्चा आया । वे छत्रपति की उपाधि धारण कर गद्दी पर बैठे और शासन व्यवस्था स्थापित की । उनके दो लड़के दो अलग पत्नियों से थे । सम्भाजी और राजाराम । सम्भाजी अय्याशी और नशे के फेर में पड़ गया । लाख समझाने पर भी नहीं सुधरा । उसे गुरु रामदास के पास भी रखा पर कोई सुधार न हुआ । उसे पनहला के क़िले में नज़रबंद कर दिया तो वह एक रात नज़र बचाकर अपनी पत्नी सहित मुग़लों के बहादुरगढ़ क़िले पर सेनापति दिलेरखान से जा मिला ।
औरंगज़ेब ने उसका उपयोग शिवाजी के विरुद्ध करना चाहा तो एक रात वह भाग कर पनहला के क़िले में वापस आ गया । शिवाजी ख़ुद उसके साथ कुछ दिन रहे । शायद सब सुधार जाए । परंतु नियति को कुछ और ही मंजूर था । वह नहीं सुधरा । उन्हें साम्राज्य का भविष्य लड़खड़ाता दिखाने लगा । शिवाजी निराश हताश होकर फ़रबरी 1680 में अपने गुरु रामदास के पास सज्जनगढ़ चले गए । लगातार तूफ़ानी गति से साम्राज्य खड़ा करने और कैद में रहने से उनका स्वास्थ्य गिर गया था एवं पुत्र की शर्मनाक स्थिति ने उन्हें अंदर से तोड़ दिया था । उनकी जीने की इच्छा जवाब दे चुकी थी

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