Wednesday, January 29, 2020

शिवाजी का युद्ध कौशल और लड़ाइयां



शिवाजी । मध्ययुगी हिंदुस्तान और आधुनिक भारत के संधि काल में भारत के क्षितिज पर एक दैदीप्यमान ध्रुव तारे का उदय हुआ । नाम था उसका शिवाजी । उसका ह्रदय उसकी माँ ने रामायण महाभारत के पात्रों की साहसिक व लोमहर्षक कहानियाँ सुना – सुना कर फ़ौलादी बनाया था । उसका दिमाग़ पिता की जागीर की देखभाल करने वाले चरित्रवान स्वाभिमानी कुशल प्रशासक व सैन्य विषयों के अच्छे जानकार दादाजी कोंडेय ने तेज़ और विलक्षण निर्णय करने वाला विकसित किया था । समर्थ गुरु रामदास ने शिवाजी की आत्मा को आध्यात्मिक ऊहापोह से विलग परमार्थ हेतु आत्म बलिदान द्वारा स्वधर्म की रक्षा और म्लेच्छ संस्कृति से स्वदेश की रक्षा व पुनर्स्थापना हेतु समर्पण संकल्पित बनाया था । शिवाजी विलक्षण व्यक्तित्व के धनी थे । पाँच वर्ष की उम्र में पिताजी द्वारा छोड़ कर चले जाने से उनका लालन पालन माँ जीजाबाई ने किया था ।

जीजाबाई पवित्र धार्मिक बहादुर महिला थीं उनके पिता और भाई की हत्या अहमदनगर के सुल्तान ने करवा दी थी । वो हिंदू धर्म की रक्षा हेतु शिवाजी को एक समर्पित सिपाही शुरू से ही बनाना चाहती थी । इसमें पुत्र की जान को ख़तरा था लेकिन उन्हें इसमें कोई संशय नहीं था कि शिवा एक दिन गुरु रामदास द्वारा परिकल्पित स्वराज्य की स्थापना ज़रूर करेगा । परिणामस्वरूप शिवाजी अपने समय के एक कुशल प्रशासक , सेनापति , वित्तीय प्रबंधक , कूटनीतिज्ञ और ग़ज़ब के साहसी व दूरदर्शी नायक थे । शिवाजी और महाराणाप प्रताप , ये दो भव्य व्यक्तित्व

भारतीय जनमानस में स्थाई रूप से विद्यमान हैं और रहेंगे । दोनो की तुलना बेमानी है लेकिन एक बात पर सहज ध्यान जाता है कि महाराणा प्रताप अपने राज्य और स्वाभिमान की मुग़लों से रक्षा करते – करते अमर हो गए । वहीं शिवाजी ने एक ऐसा साम्राज्य खड़ा किया जिसने मुग़ल साम्राज्य की चूलें हिला दीं । काश ! शिवाजी दीर्घायु होते तो शायद भारत का इतिहास अलग ही होता । लेकिन जो है सो हमारे सामने है । फिर भी हमारे नायक की उपलब्धि कम नहीं है कि अंततोगत्वा मुग़ल साम्राज्य के वारिसों को मराठों से अपनी रक्षा करवानी पड़ी तो भी मुग़ल साम्राज्य चालीस साल में ही बिखर गया । मुग़ल साम्राज्य की हद दिल्ली की सीमा तक सीमित हो गई थी । शिवाजी की नीति । शिवाजी का व्यक्तित्व गुरु रामदास के गढ़ा था । जिन पर शुक्राचार्य की शिक्षा का प्रभाव था । राक्षस राज हिरण्यकश्यप का वध विष्णु ने नरसिंह अवतार रूप में किया था । हिरण्यकश्यप की बेटी याने भक्त प्रह्लाद की बहन दिव्या और भृगु ऋषि से उत्पन्न शुक्राचार्य असुरों के गुरु थे ।

शुक्र नीति और चाणक्य की कुटिल कूटनीति को मिलाकर शिवाजी ने उस समय की कुटिल धोखाधड़ी षड्यन्त्र से आप्लावित राजनीति की काट की रणनीति विकसित की थी । युद्ध और संधि की कूटनीति का आधार शुक्रनीति था और हिंदवी स्वराज की प्रशासनिक व्यवस्था चाणक्य के ग्रन्थ “ अर्थशास्त्र ” के सिद्धांतों पर रखी थी । यहाँ अर्थशास्त्र का मतलब एकनॉमिक्स नहीं है । असल में चाणक्य ने राजनीति , अर्थनीति , समाजनीति , न्यायनीति , दंडनीति और प्रशासन नीति के सूत्र उस ग्रन्थ में पिरोए थे । उन सूत्रों का अर्थ ब्योरेवार लिखा था ताकि प्रशासनिक अमला ठीक से नियम लागू करे । इसीलिए उस ग्रन्थ को अर्थशास्त्र नाम दिया था । ऐडम स्मिथ का अर्थशास्त्र तो अट्ठारहवीं सदी में आया । उसी आधार पर युद्ध , संधि , कपट , धोखाधड़ी से शिवाजी मुग़लों की कपटपूर्ण नीति से निपट पाए जैसे शकुनि की कपट नीति से कृष्ण निपट सके थे । कुछ पश्चिमी इतिहासकारों और मुग़ल लेखकों ने उन पर छलपूर्वक लूटपाट मारकाट के आरोप लगाए थे क्योंकि जो लूट का काम मुग़ल या अंग्रेज़ करने वाले होते थे उसे शिवाजी उनसे पहले कर जाते

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