अमेरिका का स्वतंत्रता संग्राम 1775 से 1783 के बीच हुआ था । जिसमें यॉर्कटाउन की लड़ाई में लॉर्ड कार्नवालिस जो कि इंग्लैंड की फ़ौज का कमांडर था , उसको जॉर्ज वाशिंगटन के समक्ष समर्पण करना पड़ा था और अमेरिका इंग्लैंड के हाथ से निकल चुका था । अब वो हिंदुस्तान पर पूरा ध्यान और ज़ोर लगा रहे थे । उसी कार्नवालिस को 1786 में बंगाल मद्रास बम्बई की संयुक्त कमान का गवर्नर जनरल बनाकर कलकत्ता भेजा गया । उसने आते ही “ हिंदुस्तान के अंदरूनी मामलात में दख़लंदाज़ी नहीं ” की नीति की घोषणा कर दी । परंतु वह ज़्यादा दिन उस पर क़ायम न रह सका । दक्षिण में तीन ताक़तें साम्राज्य खड़ा करने को ज़ोर आजमाइश कर रहीं थीं । टीपूँ , मराठा और निज़ाम ।
पहुँच बनाती थी । साथ ही अंग्रेज़ों का कलकत्ता से मद्रास तक निर्विघ्न क़ब्ज़ा होता था । बदले में निज़ाम को मैसूर के क़ब्ज़ा किए हुए इलाक़े देने की संधि कर ली । टीपूँ को जब मालूम पड़ा तो वह सुलग गया । उसने कहा कि यह तो मंगलोर की संधि की शर्तों का घोर उल्लंघन है । अंग्रेज़ शर्तों को तोड़ने में गुरेज़ नहीं करते थे । जिसमें उनका फ़ायदा हो वही करते थे । जब अंग्रेज़ों ने कोई जबाव नहीं दिया तो उसने दिसम्बर 1789 में तंजौर पर हमला कर दिया । कार्नवालिस ने युद्ध की घोषणा कर दी । अंग्रेज़ों ने मराठों और निज़ाम से संधि करके मैसूर को जीतकर आपस में बाँट लेने का क़रार किया था । लिहाज़ा अंग्रेज़ मराठा और निज़ाम की संयुक्त सेना चारों ओर से श्रीरंगपतनम की तरफ़ बढ़ी ।
तीसरा आंग्ल – मैसूर युद्ध टीपूँ सुल्तान
बंगलोर को जीत कर टीपूँ को क़िले में घेर लिया । टीपूँ को अपमानजनक संधि के तहत 3 , 50 , 00 , 000 जी हाँ तीन करोड़ पचास लाख रुपये युद्ध मुआवज़ा की आधी रक़म तुरंत और टीपूँ के दो नाबालिग़ बेटे बतौर गारण्टी अंग्रेज़ों को सौंपने पड़े । यही रक़म आगे मराठों को ठिकाने लगाने के काम आने वाली थी । स्थिति यह हो गई कि टीपूँ के पास श्रीरंगपतनम का इलाक़ा भर रह गया । पश्चिम और दक्षिण व पूर्व में अंग्रेज़ जम गए उत्तर का इलाक़ा निज़ाम और मराठों के पास चला गया । चौथा आंग्ल – मैसूर युद्धःटीपूँ की तैयारी । टीपूँ पहला शासक था जिसने अंग्रेजों से टक्कर ली थी । इंग्लैंड के हाथ से अमेरिका निकल चुका था । इंग्लैंड की संसद में हताशा और गुस्से का माहौल था । यह अजीब संयोग है कि जब अमेरिका आज़ाद हो रहा था उस समय हिंदुस्तान गुलाम हो रहा था । लॉर्ड कार्नवालिस ( 1786 – 1793 ) “ कम से कम दखलंदाज़ी ”
की नीति इंग्लैंड की संसद से लेकर आया था कि अब हिंदुस्तान को संभाल कर चलना है । वहाँ की संसद में विपक्ष के तेज़ हमलों को सरकार नहीं संभाल सकी और एक “ आक्रामक हिंदुस्तान नीति ” के तहत लॉर्ड वेलेजली को 1798 में “ फ़ॉर्वर्ड पॉलिसी ” लागू करने के लिए भेजा । यह पहला क़दम था जिसमें इंग्लैंड ने तय कर लिया था कि अब हिंदुस्तान को गुलाम बनाना है क्योंकि अमेरिका हाथ से निकल

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