Sunday, January 26, 2020

दूसरा आंग्ल युद्ध भारतकोश, ज्ञान का हिन्दी महासागर


मददगार रहता था क्योंकि फ्रांसीसियों ने उसको आधुनिक फ़ौज बनाने में सहायता पहुँचाई थी । उसकी चाल थी कि वो पहले पानीपत की लड़ाई से लड़खड़ाए मराठों को दक्षिण से भगा दे , फिर निज़ाम को निपटा कर फ्रांसीसियों के साथ मिलकर अंग्रेज़ों को दक्षिण से चलता करे । 12 नवम्बर 1766 को अंग्रेज़ों ने निज़ाम के साथ एक गुप्त सुरक्षा संधि कर ली ।





उधर निज़ाम और मराठा मिलकर हैदर अली के विरुद्ध मोर्चा बना रहे थे । ये दोनो बातें जब हैदर अली को पता चली तो उसने मराठों के साथ आसान शर्तों पर समझौता कर लिया और निज़ाम को साथ लेकर जनवरी 1767 में कवेरिपतनम में अंग्रेज़ों को घेर लिया । इस कारण पहला आंग्ल मैसूर युद्ध शुरू हो गया।

कर्नल स्मिथ मद्रास से एक टुकड़ी लेकर त्रिनोमल्ली की तरफ़ बढ़ा जहाँ उसे त्रिचनापल्ली से वुड की फ़ौज आकर मिलने वाली थी । फिर वे मिलकर कवेरिपतनम को बचाने जाने वाले थे । हैदर अली ने उनको चांगमा नामक जगह पर रोक लिया । हैदर अली और निज़ाम की संयुक्त फ़ौज हार रही थी उसी समय वुड की फ़ौज आ गई । तभी तेज़ बारिश के कारण दोनो सेनाएँ वापस बंकरो में लौट गई । युद्ध रुक गया । मार्च 1769 में हैदर अली ने एक बड़ी फ़ौज लेकर मद्रास पर घेरा डाल दिया । अंग्रेज़ तैयार नहीं थे इलाहाबाद में उलझे थे । उन्होंने 4 अप्रेल 1769 को मद्रास की संधि करके हैदर अली को सारे इलाक़े वापस लौटा दिए और युद्ध की दशा में एक दूसरे की सुरक्षा की संधि कर ली । बेवजह बहादुरी दिखाने के चक्कर में फ़ौज कटवाना और आर्थिक नुकसान उठाना अंग्रेज़ों को बेवकूफ़ी लगता था ।

मैसूर युद्ध – भारतकोश, ज्ञान का हिन्दी महासागर

हालाँकि अंग्रेज़ हैदर अली के फ्रान्स से जुड़ाव के कारण उस पर भरोसा नहीं करते थे । 1771 में पेशवा माधव राव के नेतृत्व में मराठों ने मैसूर पर धावा बोल दिया तो हैदर अली ने अंग्रेज़ों को संधि की याद दिलाते हुए सहायता चाही । अंग्रेजो के कान पर जूं नहीं रेंगी । लिहाजा हैदर अली अंग्रेज़ों से नफ़रत करने लगा । यही नफ़रत उसे ले डूबी । युद्ध और राजनीति में नफ़रत नहीं बल्कि गिरगिट की तरह रंग बदलना अच्छी कूटनीति मानी जाती है और युद्ध में जीत ही निर्णायक होती है । कोई स्थाई दोस्त नहीं

आसान शर्तों पर समझौता कर लिया और निज़ाम को साथ लेकर जनवरी 1767 में कवेरिपतनम में अंग्रेज़ों को घेर लिया । इस कारण पहला आंग्ल मैसूर युद्ध शुरू हो गया । कर्नल स्मिथ मद्रास से एक टुकड़ी लेकर त्रिनोमल्ली की तरफ़ बढ़ा जहाँ उसे त्रिचनापल्ली से वुड की फ़ौज आकर मिलने वाली थी । फिर वे मिलकर कवेरिपतनम को बचाने जाने वाले थे । हैदर अली ने उनको चांगमा नामक जगह पर रोक लिया । हैदर अली और निज़ाम की संयुक्त फ़ौज हार रही थी उसी समय वुड की फ़ौज आ गई । तभी तेज़ बारिश के कारण दोनो सेनाएँ वापस बंकरो में लौट गई । युद्ध रुक गया । मार्च 1769 में हैदर अली ने एक बड़ी फ़ौज लेकर मद्रास पर घेरा डाल दिया । अंग्रेज़ तैयार नहीं थे इलाहाबाद में उलझे थे । उन्होंने 4 अप्रेल 1769 को मद्रास की संधि करके हैदर अली को सारे इलाक़े वापस लौटा दिए और युद्ध की दशा में एक दूसरे की सुरक्षा की संधि कर ली । बेवजह बहादुरी दिखाने के चक्कर में फ़ौज कटवाना और आर्थिक नुकसान उठाना अंग्रेज़ों को बेवकूफ़ी लगता था । हालाँकि अंग्रेज़ हैदर अली के फ्रान्स से जुड़ाव के कारण उस पर भरोसा नहीं करते थे । 1771 में पेशवा माधव राव के नेतृत्व में मराठों ने मैसूर पर धावा बोल दिया तो हैदर अली ने अंग्रेज़ों को संधि की याद दिलाते हुए सहायता चाही ।

अंग्रेजो के कान पर जूं नहीं रेंगी । लिहाजा हैदर अली अंग्रेज़ों से नफ़रत करने लगा । यही नफ़रत उसे ले डूबी । युद्ध और राजनीति में नफ़रत नहीं बल्कि गिरगिट की तरह रंग बदलना अच्छी कूटनीति मानी जाती है और युद्ध में जीत ही निर्णायक होती है । कोई स्थाई दोस्त नहीं कोई पक्का दुश्मन नहीं । देश काल परिस्थिति के अनुसार गिरगिट सा रंग बदलना राजनीति का शग़ल है । दूसरा आंग्ल मैसूर युद्ध । मैसर की अंग्रेज़ों से रक्षा संधि के बाद भी 1771 – 72 में मराठा आक्रमण के समय अंग्रेज़ों की मदद न मिलने से हैदर अली चिढ़ा हुआ था क्योंकि उसे मराठा और निज़ाम से एकसाथ निपटना पड़ा था ।


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