Friday, January 31, 2020

चौथा मैसूर युद्ध और टीपू सुल्तान का अंत



उधर फ्रान्स में नेपोलियन का उदय हो चुका था वह भी अंग्रेज़ों का जानी दुश्मन था । वह मिश्र की मुहिम में अंग्रेज़ ऐड्मरल नेल्सन से हार कर लौट रहा था । फ्रान्स की क्रांतिकारी सरकार ने हार की निराशा से निपटने हेतु भारत में टीपूँ के पास 10 , 000 सैनिक भेज दिए । टीपूँ ने मॉरिशस के जनरल मलर्टिक को भी पत्र भेजकर मदद माँगी । 15 मई 1797 को श्रीरंगपतनम में फ्रान्स का झंडा लहराया गया 2 , 300 तोपों की सलामी दी गई । लॉर्ड वेलेजलि ने उसी समय कलकत्ता पहुँचकर स्थिति का जायज़ा लिया और युद्ध की तैयारी शुरू कर दी । उसने सबसे पहले निज़ाम को रक्षा संधि से अपने पक्ष में कर लिया । पेशवा ने ऐसी संधि से मना कर दिया न ही फ़ौज भेजने का प्रस्ताव मजूर किया । तटस्थता की नीति अपनाई । फिर वेलेजलि ने 8 नवम्बर 1798 को टीपूँ को चिट्ठी लिख कर चेतावनी दी कि वह अपनी तैयारी स्थगित कर दे और फ्रान्स के सैनिक व युद्ध सामग्री वापस कर दे । टीपूँ ने कोई जबाव नहीं दिया तो वेलेजलि 31 दिसम्बर 1798 को युद्ध की कमान सम्भालने मद्रास पहुंच गया

। 9 जनवरी 1799 को उसने फिर एक कड़ी चिट्ठी टीपूँ को लिखी । उसकी भी टीपूँ ने परवा नहीं की । युद्ध के बादल मैसूर के आसमान पार छाने लगे । गिद्द ताज़े मानव माँस की प्रत्याशा में अपने डैने तौलकर श्रीरंगपतनम के महल पर उतरने लगे । चौथा मैसूर युद्धःटीपूँ सुल्तान का अंत । टीपूँ सुल्तान को “ मैसूर का शेर ” कहा जाता था । हिंदुस्तान में शेर सबसे ताक़तवर माना ही नहीं जाता , होता भी है । लेकिन यह मध्ययुग की मान्यता थी जब शेर को तलवार भाला या कुल्हाड़ी से मारा जाता था ।

शेर को तलवार से मारने वाले को शेरशाह सूरी के नाम से पुकारा जाता था । अब अंग्रेज़ों की मिलिटरी अकैडमी में शेर का शिकार तलवार से नहीं बल्कि जंगली कुत्तों की तरह चारों तरफ़ से घेर कर उसकी एक – एक बोटी काटकर किया जाना सिखाया जाता था । लॉर्ड वेलेजलि ने टीपूँ को ऐसे ही घेरकर मारा था । टीपूँ को अंदेशा था कि अंग्रेज़ मद्रास से रवाना होकर बैंगलोर की तरफ़ उत्तर से हमला करेंगे । जनरल हैरिस की कमान में 11 फ़रबरी 1799 को पूर्व में वेल्लोर की तरफ़ से मैसूर पर हमला किया । दूसरी तरफ़ जनरल

रक़म चुका कर अपने दोनो बच्चों को छुड़ा लिया था । उसके बाद वो युद्ध की तैयारी में जुट गया । उसने मुस्लिम देश तुर्की , फ्रान्स , बग़दाद , अफ़ग़ानिस्तान अपने प्रतिनिधि भेजकर अंग्रेज़ों के विरुद्ध एक सशक्त मोर्चा बनाने की शुरुआत कर दी ताकि अंग्रेज़ों को हिंदुस्तान से निकाल बाहर किया जा सके । टीपूँ ने इस मुहिम को मराठों का साथ न मिलने से एक धार्मिक रंग देकर जिहाद का नाम दिया था कि तीस साल पुराना मुस्लिम देश ख़तरे में है जो हिंदू राजा को हटाकर क़ायम किया गया था । यानि इस्लाम ख़तरे में है । यह पहला मौक़ा था जब अंग्रेज़ों को हिंदू – मुस्लिम भेदभाव का पता चला । उधर फ्रान्स में नेपोलियन का उदय हो चुका था वह भी अंग्रेज़ों का जानी दुश्मन था । वह मिश्र की मुहिम में अंग्रेज़ ऐड्मरल नेल्सन से हार कर लौट रहा था । फ़्रान्स की क्रांतिकारी सरकार ने हार की निराशा से निपटने हेतु भारत में टीपूँ के पास 10 , 000 सैनिक भेज दिए । टीपूँ ने मॉरिशस के जनरल मलर्टिक को भी पत्र भेजकर मदद मांगी ।

15 मई 1797 को श्रीरंगपतनम में फ्रान्स का झंडा लहराया गया 2 , 300 तोपों की सलामी दी गई । लॉर्ड वेलेजलि ने उसी समय कलकत्ता पहुँचकर स्थिति का जायजा लिया और युद्ध की तैयारी शुरू कर दी । उसने सबसे पहले निज़ाम को रक्षा संधि से अपने पक्ष में कर लिया । पेशवा ने ऐसी संधि से मना कर दिया न ही फ़ौज भेजने का प्रस्ताव मजूर किया । तटस्थता की नीति अपनाई । फिर वेलेजलि ने 8 नवम्बर 1798 को टीपूँ को चिट्ठी लिख कर चेतावनी दी कि वह अपनी तैयारी स्थगित कर दे और फ्रान्स के सैनिक व युद्ध सामग्री वापस कर दे । टीपूँ ने कोई जबाव नहीं दिया तो वेलेजलि 31 दिसम्बर 1798 को युद्ध की कमान सम्भालने मद्रास पहुंच गया । 9 जनवरी 1799 को उसने फिर एक कड़ी चिट्ठी टीपूँ को लिखी । उसकी भी टीपूँ ने परवा नहीं की । युद्ध के बादल मैसूर के आसमान पार छाने लगे । गिद्द ताज़े मानव माँस की प्रत्याशा में अपने डैने तौलकर श्रीरंगपतनम के महल पर उतरने लगे । चौथा मैसूर युद्धःटीपूँ सुल्तान का अंत ।


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