औरंगज़ेब ने उसके सामने शर्त रखीं की वह ख़ज़ाने का पता बता दे , सारे क़िले सौंप दे और उन मुग़ल अफ़सरों के नाम बताए जो उससे मिले हुए हैं तो उस पर कड़ी कार्यवाही नहीं होगी । सम्भाजी ने घूरकर कहा कि औरंगज़ेब अपनी बेटी की शादी उससे कर दे तो बता देगा । औरंगज़ेब ने उन दोनो को यातनाएँ देकर ख़त्म करने का आदेश दे दिया । अगले दिन दोनो की आँख गरम सलाखों से फोड़ दी गईं । कलश की जुबान खींच के निकाल दी । सात दिन अनेकों अमानुषिक यातनाएँ देने के बाद उनको मार कर उनका माँस कुत्तों को खिला दिया । पूरा महाराष्ट्र अभी तक उन अमानुषिक यातनाओं को याद करके सुलगते रहता है । मराठों को इकट्ठा करने का काम जो काम सम्भाजी जीवित रह के न कर सका , उसकी मौत ने कर दिया । सम्भाजी के लड़के और पत्नी को शाही हिरासत में ले लिया ।
मराठा सामाज्य की दुर्दशा
शिवाजी का दूसरा लड़का राजाराम 1689 से 1700 तक छत्रपति रहा । उसके अचानक मर जाने से उसकी विधवा ताराबाई ने अपने नाबालिग लड़के शिवाजी द्वितीय को छत्रपति बनाकर शासन सम्भाला । वह तेज़ तर्रार और कुशल प्रशासक थी । मुग़ल साम्राज्य में औरंगज़ेब के मरते ही उत्तराधिकार के झगड़ों से निपटते हुए आज़मशाह गद्दी पर बैठा ताराबाई को कमज़ोर करने के लिहाज़ से उसने शाहू जी को नज़रबंदी से मुक्त करके दक्षिण भेजनेवाला था । वह भोपाल के पास श्यामपुर दोराहा में ठहरा था तब ही शाहू जी अपनी माँ येशुबाई के साथ धीरे से खिसक लिया । उसने राजगढ़ पहुँच कर गद्दी पर क़ब्ज़ा कर लिया । ताराबाई के बहुत से दरबारी उससे आ मिले । शाहू जी ने 1707 से 1748 तक राज्य किया । उसने धीरे – धीरे सत्ता पेशवा के हाथ में सौंप दी और सतारा में विलासिता पूर्ण जीवन बिता कर मर गया । शाहू जी की औलाद नहीं थी ।
तारा बाई कुछ इलाक़ा लेकर कोल्हापुर में निर्वासित जीवन बिता रही थी । उसका पुत्र शिवाजी द्वितीय मर चुका था तो उसने एक लड़के को शिवाजी द्वितीय का मृत्यु उपरांत पुत्र बता कर रामराजा के नाम से 14 जनवरी 1750 को छत्रपति के रूप में अभिषेक करवा लिया । उस समय बालाजी बाजीराव पेशवा था । ताराबाई रामराजा को पेशवा से नहीं मिलने देती थी तो पेशवा ने उन दोनो को पूना बुलाकर संगोला समझौता करवाया जिससे बची खुची सत्ता भी पेशवा के हाथ में चली गई । छत्रपति के रूप में शिवाजी का वंश समाप्त हो गया । जिन ब्रह्मणो ने शिवाजी का अभिषेक करने से मना किया था उन्होंने ही उनकी सत्ता हथिया ली । पेशवाई का उत्थान और पतन । शाहू जी जब औरंगज़ेब की कैद में दौलताबाद में था उस समय बालाजी विश्वनाथ की पदस्थता मराठा शासन में आसपास थी । वह शाहू जी से मिलने आता रहता था । अतः दोनो की मित्रता हो गई थी ।
बालाजी विश्वनाथ कोंकनस्थ चितपावन ब्राह्मण था । वह 1689 में माल विभाग में लिपिक था । शाहूजी जब छत्रपति बने तो उसने बालाजी विश्वनाथ को पेशवा नियुक्त किया । पेशवा ने मुग़लों से 1719 में संधि के द्वारा चौथ और सरदेशमुखी वसूलने के अधिकार प्राप्त कर लिए । उसने स्वराज की आय कई गुना बढ़ा दी और शाहू जी के विरोधियों का सफ़ाया कर दिया । तोडरमल की कर नीति के अनुसार अधीनस्थ राज्य की आय का 25 % चौथ और लोगों की आय का 10 % सरदेशमुखी वसूलने की माकूल व्यवस्था पेशवा ने की थी । इस कारण मराठा साम्राज्य के ख़ज़ाने भरना शुरू हो गए । बालाजी विश्वनाथ 1713 से मृत्यु पर्यन्त 1720 तक पेशवा रहा । उसने मराठा साम्राज्य को स्थिर कर दिया था । उसके बाद उसका बड़ा लड़का बाजीराव पेशवा बना । वह बहुत बहादुर , चतुर कूटनीतिज्ञ , और सफल सेनानायक था ।
उसने अपनी 20 साल की पेशवाई में 27 युद्ध लड़े और एक भी नहीं हारा । उसने दक्षिण भारत , मालवा , गुजरात , बुंदेलखंड , दिल्ली , अवध , उड़ीसा और बंगाल की सीमा तक मराठा साम्राज्य का विस्तार कर दिया । उसके अधीन गायकवाड़ , होलकर , सिंधिया , भोंसले और पवार जैसे मराठा सरदार उन्नति करके सफल सेनापति बने । बाद में सभी ने अपने स्वतंत्र राज्य भी क़ायम कर लिए । छत्रसाल बुंदेला को मुग़लों से मुक्त करवाया । इनाम में मिली मस्तानी को लेकर पूना गया । वहाँ मस्तानी से शमशेर बहादुर नामक पुत्र उत्पन्न हुआ जो पानीपत की तीसरी कड़ाई में मारा गया था । मस्तानी को पूना के कट्टरपंथी समाज ने कभी स्वीकार नहीं किया । इसी विवाद की भेंट चढ़ कर बाज़ीराव 40 साल की उम्र में ही सिधार गया । 1740 में उसका लड़का बालाजी बाजीराव पेशवा बना । उसने कर्नाटक , मैसूर और हैदराबाद को नियंत्रण में किया । जनवरी 1761 में पानीपत की तीसरी लड़ाई में उसका चचेरा भाई सदशिव राव और बेटा विश्वास राव भेंट चढ़ गए । मराठों की बहुत बुरी हार वह सहन न कर सका और 23 जून 1761 की अल्पायु में उसकी मृत्यु हो गई ।

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