Friday, January 31, 2020

वीर शिवाजी और मिर्जा जयसिंह


समय के सबसे क़ाबिल मिर्जा राजा जयसिंह के नेतृत्व में बड़ी मुहिम शिवाजी के विरुद्ध छेड़ी , जिसका अंत शिवाजी की आगरा में नज़रबंदी से हुई । शिवाजी और राजा जयसिंह । जयसिंह आमेर के राजा थे जिन्हें मिर्जा की उपाधि औरंगज़ेब ने दी थी । उन्होंने मुग़ल साम्राज्य के लिए कई मुश्किल लड़ाइयाँ जीतीं थीं और वे बहुत ही प्रतिभा सम्पन्न और कूटनीतिज्ञ व्यक्तित्व के धनी थे । सूरत में शिवाजी की कार्यवाही से रुष्ट होकर औरंगज़ेब ने मनचाहे सिपहसलार के अधीन मनचाही फ़ौज और मनचाहा धन देकर जयसिंह को शिवाजी को नियंत्रण में लाने भेजा । जयसिंह ने सबसे पहले बीजापुर गोलकुंडा को कूटनीतिक चालों में फाँसकर यह निश्चित कर लिया कि वे या तो तटस्थ रहेंगे या दक्षिणपूर्व से शिवाजी के राज पर हमला करेंगे ।

उसने कई मराठा सरदारों को फोड़ लिया । उसके बाद अफ़ज़ल खान के बेटे , जवाली के राजकुमार , जज़ीरा के सिद्दी और जो भी शिवाजी से द्वेष रखते थे , उन सबको इकट्ठा कर शिवाजी पर चारों तरफ़ से हमला किया । उसने सासबड से मुहिम शुरू की । कई सैनिक टुकड़ियों की छापामार लड़ाईयों से मराठों के गाँव उजाड़ना शुरू किया । शिवाजी की छापामार लड़ाई की काट राजा जयसिंह ने छापामार मुहिम से ही निकाली । वह शिवाजी को पुरन्दर के क़िले में घेरने चला । सबसे पहले पूर्वी किनारे का वज्रगढ़ का क़िला घेरा डाल कर जीत लिया । क़िले रक्षकों को मारे बिना घर जाने दिया ताकि पुरन्दर के रक्षक लडे बिना ही क़िला सुपुर्द कर दें । फिर माची दुर्ग छीन लिया । शिवाजी यहाँ घिरे गए थे । वहीं परवर्ती इलाक़ों पर मुग़लों की टुकड़ियाँ क़हर वरपा रही थी । मजबूर होकर शिवाजी ने समर्पण का निर्णय किया और 24 जून 1665 को जयसिंह से सुरक्षा का विश्वास पाकर शिवाजी सीधे राजा जयसिंह के पंडाल में पहुँच गए । जयसिंह ने आगे बढ़कर शिवाजी को गले लगाया और अपने पास बिठा लिया । उसी समय जयसिंह ने दिलेर खान और तीर्थसिंग नामक सिपाहसालारों को पुरन्दर पर आक्रमण तेज़ करने की आज्ञा दी । शिवाजी राजपूत खेमे से मराठों को मरते देखते रहे । जयसिंह दिखाते रहे ताकिइसके बाद शिवाजी दक्षिण की सूबेदारी चाह रहे थे तो राजा जयसिंह ने पाँच हज़ारी मनसबदारी , अच्छी जागीर और 50 , 000 नक़द देकर और उसे दक्षिण की सूबेदारी मिलने की सम्भावना के मद्देनज़र औरंगज़ेब से आगरा में मिलने हेतु तैयार कर लिया ।

जयसिंह के पुत्र रामसिंह के सुरक्षा वचन और दरवार में सम्मान का भरोसा मिलने पर शिवाजी ने आगरा जाना मंजूर कर लिया । यह बहुत दुस्साहसिक निर्णय था । शिवाजी और औरंगज़ेब एक दूसरे के जानी दुश्मन थे । शिवाजी 16 मार्च 1666 को अपने पुत्र सम्भाजी 5 बड़े पदाधिकारी और 350 चुने हुए सैनिक दस्ते के साथ मौत से मुलाक़ात को आगरा रवाना हुए । ये अलग बात है कि बाद में वो मौत को चकमा देकर वापस रायगढ़ आ गए थे । धौलपुर के आगे मुंबई आगरा रोड पर सराय मानिकचन्द के खंडहर आज भी मौजूद हैं । 21 मई को शिवाजी वहीं रुके थे । रामसिंग के मुंशी गिरधारीलाल ने उनका स्वागत उस सराय में किया क्योंकि रामसिंग की तैनाती उस रात शाही महल पर लग गई थी ।

अगले दिन दीवाने आम पहुँचने में देर हो गई । औरंगज़ेब उठ कर दीवाने ख़ास में चला गया था । अतः मीर बक्शी असद खान ने शिवाजी को वहीं पेश किया । शिवाजी ने एक हज़ार मुहर और दो हज़ार रुपये नक़द बतौर नज़राना पेश किए एवम् पाँच हज़ार रुपये बादशाह पर न्योछावर किए । औरंगज़ेब कुछ नहीं बोला , बस उनकी ओर एक नज़र भर के देख लिया । शिवाजी को पाँच हज़ार मनसबदारों की तीसरी पंक्ति में खड़ा किया गया था । उनके सामने जसवंत सिंग सिसोदिया खड़ा था जो मराठों से लड़ाई में पीठ दिखा के भाग गया था । उसके बाद खिलअत भेंट की गईं । जसवंत सिंह की प्रशंसा की गई । शिवाजी को खिलअत नहीं भेंट की गई । शिवाजी के तन बदन में आग लग गई । औरंगज़ेब ताड़ गया । उसने रामसिंग से शिवाजी की हालात के बारे में पूछा । जब रामसिंग शिवाजी के पास गया तो शिवाजी ने कहा “ तुमने मुझे देखा है तुम्हारे पिताजी ने मुझे देखा है बादशाह ने देखा है । जानते हो मैं किस प्रकार का आदमी हूँ फिर भी मुझे तीसरी पंक्ति में खड़ा किया । मैं मनसबदारी ठुकराता हूँ । ” यह कहकर औरंगज़ेब की तरफ़ पीठ करके दरबारे ख़ास से चले गए । जब अकबर मानसिंग से मिला था तो दो सभ्यताएँ मिली थीं और जब औरंगज़ेब शिवाजी मिले तो दो सभ्यताएँ टकराईं थीं जिसकी गूंज आज तक हिंदुस्तान की फ़िज़ा में मौजूद है ।

रामसिंग ने उनका हाथ पकड़ कर लाना चाहा तो शिवाजी हाथ छुड़ाकर एक खम्भे के पीछे जाकर बैठ गए । रामसिंग ने शिवाजी की तबियत ख़राब होने का बहाना बना दिया । कुछ सामंतो के समझाने पर भी वो नहीं आए । एक दरबारी ने औरंगज़ेब को सही स्थिति बताई । औरंगज़ेब ने रामसिंग को आज्ञा दी की वो शिवाजी को अपने निवास पर ले जाए । दूसरे दिन भी शिवाजी ने दरबार में जाने से मना कर दिया । शिवाजी जयसिंग के वचन से रामसिंग की सुरक्षा में थे अतः औरंगज़ेब उनको सीधा नहीं मरवा सकता था । वह उनको मारने की जुगत बिठाने लगा । शिवाजी की मुक्ति । मुग़ल दरबार में राजपूतों के दो गुट थे कछवाहा राजपूत राजा जयसिंग का गुट और राठौरों के प्रतिनिधि जसवंतसिंह के नेतृत्व वाला गुट । शिवाजी को राजा जयसिंग ने सुरक्षा का वचन दिया था , जिसकी ज़िम्मेदारी उनके पुत्र रामसिंग पर थी । जसवंतसिंह गुट चाहता था कि शिवाजी को मार डाला जाय जिससे कछवाहा गुट की हेठी तय थी ।

शाइस्ताखान जिसका अंगूठा पूना में शिवाजी के आक्रमण से कट गया था । उसका भाई जाफ़रखान वज़ीर था इन दोनो की बीबियाँ शिवाजी का वध चाहतीं थीं औरंगज़ेब की बहन जहाँआरा भी शिवाजी के विरुद्ध थी । औरंगज़ेब राजा जयसिंग को नाराज़ नहीं करना चाहता था । वह शिवाजी को ऐसे मारना चाहता था कि मौत स्वाभाविक लगे । औरंगज़ेब ने शिवाजी को एक कुख्यात रादनदाज खान के सुपुर्द करने की सोची ताकि वो शिवाजी को ठिकाने लगा दे । रामसिंग ने इसका विरोध किया तो उसने शिवाजी को राजा जयसिंग के जयपुर भवन में रखवाया । औरंगज़ेब ने निर्णय किया कि शिवाजी को अफ़ग़ानिस्तान के यूसुफ़जाईं और अफ़रीदी कबीलों के विद्रोह को दबाने के लिए भेजा जाए ताकि रास्ते में मरवा दे । इसके लिए वो वह जयसिंग की सहमति की प्रतीक्षा कर रहा था , मामला लटका रहा । इस बीच शिवाजी ने दरबारियों को रिश्वत देकर अपने पक्ष में कर लिया । बात आयी गयी हो गई ।

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